Tuesday, November 1, 2011

मैं कोई और नहीं..

तुम्हारा इंतज़ार हूँ..

अपने इस सच का क्या करूँ
जीने नहीं देती

न चैन से मरने देती है
आधी रात को जगाती है

और जब तक के मैं मान नहीं जाती
के बस यही सच है
ये मुझे सताती है

जब तक मुझसे यह दो बात सुन न ले..
सताती रहती है

किसी और बहाने से
कुछ और तरीके से
कुछ छुपा कर
कभी गुनगुना कर

नहीं
कोई तरकीब नहीं मानती

अब मैं क्या करूँ
कैसे कहूँ
और फिर कितनी बार कहूँ
अब तो कहने का जी भी नहीं करता


कोई रास्ता हो तो दिखाओ
कोई उम्मीद हो तो बताओ
हार गयी हूँ
अब तो मान जाओ

गुमनाम होकर
यूँ चुपचाप रहकर...

तुम में ही मैं हूँकोई और नहीं

बस यही सच है

मैं
तुम्हारा इंतज़ार हूँ
बस इतना सा सच है

जो मैं नहीं कह पा रही
तुम एक बार कह दो...
और कुछ नहीं
इस इंतज़ार को एक नाम देदो
इस सिलसिले को फिर एक पहचान देदो
मेरी चलती हुई साँसों को
एक वजह दे देदो
मुझे मेरी.. पहचान दे देदो..

मैं और कोई नहीं...
बस..

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